बता तुझको हुआ क्या है ?

अक्टूबर 27, 2009

ए अमरवीर , ए भरतपुत्र

बता तुझको हुआ क्या है ?

परिस्थितियों का दास बनकर,

खो दिया उल्लास तुमने,

अपने बाजुओं की ताकतों का

क्या किया कभी आभास तुमने ?

मत रो कि तुम वीरपुत्र हो,

उठ खड़े हो –

अभी लुटा क्या है ?

लेके आये थे मानव जन्म,

और पशु सा जीवन हो गया |

पेट – प्रजनन में ही न जाने,

जीवन लक्ष्य कहाँ पे खो गया ?

किस नशे में धुत तू पड़ा,

जरा सोच –

ज़िन्दगी से तेरा रिश्ता क्या है ?

संस्कृति का खुले आम,

हो रहा है मान मर्दन ;

आज अनैतिकता, आतंक से

मानवता कर रही क्रंदन

और खौलता नहीं तेरा लहू ,

जरा सोच –

इसमें मिला क्या है ?

हे युवा !उठो, जागो

और लक्ष्य पाने तक रुको नहीं,

आंधी आये या तूफ़ान,

अपने आदर्शों से झुको नहीं |

आने दो हवाओं को पास अपने,

वो पूछेंगे इक दिन –

बता तेरी दिशा क्या है ?

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आमंत्रण

Invitationराष्ट्र कुण्डलिनी युवा शक्ति के जागरण हेतु

युवा चेतना शिविर, आलंदी ( पुणे )

६-७-८ नवम्बर २००९

संपर्क – ९८८१२४७६५६, ९८८१७४०४३९

http://www.pune.awgp.org

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ये बताओ क्या करें हम

अप्रैल 20, 2009

हे गुरु हे मार्गदर्शक, तुमसे एक विनती करें हम,
मन फँसा है उलझनों में, ये बताओ क्या करें हम |
तुम चले गये देह ‘पार्थिव’ छोड़कर, व्यामोह को निरर्थक बताकर,
हो गये विलीन ‘कारण’ में, संग रहने का विश्वास दिलाकर |
हाँ हम तुम्हारी अनुभूति, हर क्षण को पाते हैं,
हर राह निष्कंटक करते हुए, तेरे अंश आते हैं |
पर कभी टीस जो इतनी ‘नासूर’ हो,
तेरे दर्शन के बिना नहीं कुछ मंजूर हो,
तो बताओ क्या करें हम??

तुम ‘धूप-दीप-नैवेद्द्य’ अर्पण, सबको निरर्थक बताते हो,
बस ‘जीवन-साधना’ में ही, शिष्य होने का मूल्य चाहते हो |
हाँ ये वादा है हमारा, सदैव तुम्हारे पथ पर चलेंगे,
जीवन के अंतिम प्रहर तक, अपने दुष्प्रवृत्तियों से लड़ेंगे |
पर इतने पे भी जो मन ना माने,
कुछ भाव रूप देने को ठाने,
तो बताओ की क्या दें हम ??

तुम पिता से गुरु हुए, फिर गुरु से भगवान हो गये ,
हम पुत्र तेरे सान्निध्य में, नरपशु से इंसान हो गये |
पर नादान मन है इसी ज़िद में, उसे पुत्र होने का भान चाहिए,
तुम भले ही हो भगवन, पर तेरी गोद में स्थान चाहिए |
ऐसे चिंतन में कोई ग़लती हो जाए,
कोई शब्द गरिमा अनुकूल ना आए,
बताना भगवन किसे दोष दें हम ??

– ‘अंतः उर्जा जागरण सत्र’ के दौरान (13.03.09)


नया साल

दिसम्बर 31, 2008

आओ नया साल कुछ इस तरह से मनाएँ,

किसी उदास चेहरे को हंसा कर दिखाएँ |

दादी गिर पड़ी है , आँखों में रोशनी नहीं है,
चलो कुछ समय निकालकर, उन्हें चश्मा दिला लाएँ |
सूज चुकी है बूढ़े पिता की आँखें, बेटे के आने के इंतजार में,
चलो कुछ समय को, उनके बेटे हम बन जाएँ |
सड़क किनारे वो अम्मा, कितनी देर से खड़ी हैं,
चलो उसकी हथेली पकड़कर, उस पार हम कराएँ |
खामोश हो गई है बहना, घर की परिस्थितियाँ समझकर,
चलो अपने कंधे मिलाकर, उनकी डोली हम उठवाएँ |
भाई मायूस हो गया है, अपने सपनों को देखकर बिखरते,
चलो संग बैठें उसके, उसकी आँखों में नये सपने हम सजाएँ |
खो चुके हैं जो बहुत कुछ, नियति के कहर में,
चलो ऐसे लोगों की दुनियाँ, फिर से हम बसाएँ |

कुछ देर के लिए, भूलें हम खुद को,
कुछ देर के लिए, हम सबके हो जाएँ |
बाँटें छोटीछोटी खुशियाँ, छोटेछोटे गम बँटाएँ,
आओ नया साल कुछ इस तरह से मनाएँ |
नववर्ष के शुभकामनाओं सहित, राजेश रंजन आर्य


कड़ी

मार्च 13, 2008

कड़ी जो जोड़ती है-
कर्तव्य को अधिकार से,
वाणी को व्यवहार से,
सादगी को श्रृंगार से,
नफ़रत को प्यार से ।

कड़ी जो जोड़ती है –
अमीर को फ़कीर से,
आत्मा को शरीर से,
प्रसन्नता को पीर से,
जोशीलेपन को धीर से |

कड़ी जो जोड़ती है-
संस्कृति को सभ्यता से,
बड़प्पन को महानता से,
भौतिकता को नैतिकता से,
आदर्शवाद को व्यावहारिकता से ।

कड़ी जो जोड़ती है-
फ़ैशन को शालीनता से,
पुरातन को नवीनता से,
अहंकार को हीनता से,
सरलता को गंभीरता से ।

कड़ी जो जोड़ती है-
दिल को दिमाग से,
पानी को आग से,
मनोरंजन को वैराग से |

कड़ी जो जोड़ती है-
अध्यात्म को विज्ञान से,
श्वाँस को प्राण से,
अस्थिरता को विराम से ।

कड़ी जो जोड़ती है-
जवानी को बुढ़ापे से,
आँगन को अहाते से ।

कड़ी जो जोड़ती है-
पूरब को पश्चिम से,
आदि को अंतिम से ।

कड़ी जो जोड़ती है-
तुच्छ को महान से,
इंसान को भगवान से,
इंसान को इंसान से ।

वो कड़ी कहीं खो गयी है शायद ।
क्या हममें है वो लचक,
कि हम बन सकें वो कड़ी ?


विचार-क्रांति अभियान

जून 17, 2007

यों कोसने परिस्थिति को, सौ बहाने हमने पाए हैं,

किंतु जूझने को अंधकार से, कितने कदम हमने उठाए हैं ?

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कहने को हर कोई कहता, राष्ट्र दुर्बल, अविकसित, अनुशासनहीन है,

पर अपने को क्या वास्ता, अपनी दुनिया तो रंगीन है ?

दिनों-दिन समाज में, लूट-बलात्कार-हिंसा बढ़ रहे,

और हम हाथों-पे-हाथ धरकर, अपनी बारी का इंतजार कर रहे ।

यूँ जाति-धर्म के नाम पर, हम हमेशा से लड़ रहे,

पर उन चलचित्रों का क्या, जो संस्कृति को नंगा कर रहे ?

जो लूटता कोई हमें तो कहते, भगवन ! क्यों भेजा आततायी को,

कैसे हो गये हम विस्मृत, कि कल ठगा था अपने भाई को?

परीक्षा-परिणामों से बढ़ती खु़दकुशी, क्यों हृदय हुआ इतना कमजोर ?

अँधाधुँध दिमागी प्रतियोगिता में, हम भूल गये बाहुओं का जोर ।

वृद्ध माँ-बाप की बढ़ती दुर्दशा, हर तरफ़ टूटता परिवार है,

कहाँ गया वो प्रेम-स्नेह, जो सुखी परिवार का आधार है ?

हमको ना थी कुछ खबर, हम तो उलझे रहे व्यापार में,

कब मानसिकता हुई इतनी तंग, कि बेटे-बेटी बिकने लगे बाजार में ?

जो फाँसती कोई बीमारी, तो कहते प्रकृति का प्रकोप है,

यूँ मुँह में लेकर गाँजा-सिगरेट, कहते जवानी का शौक है ।

क्या गूँजती नहीं कानों में, बाढ़-सूखा पीड़ितों की आवाज,

क्या करम हम कर रहे, कि प्रकृति हुई हमसे नाराज ?

धन-बल की अति-महत्वाकांक्षा में, मानवता का शोषण हो रहा,

और इस अत्याचार से, नक्सलवाद, आतंकवाद का पोषण हो रहा ।

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हे प्रभु, कैसी दृष्टि आज, कि कुछ पुण्य नहीं, कुछ पाप नहीं,

अपने कुकर्मों पे पश्चाताप नहीं, अपने पतन पर भी विलाप नहीं ?

इस दृष्टि ने ऐसे करवाये, मानव से अप्राकृतिक, अनैतिक काम,

प्रकृति हो गई रूष्ट हमसे, मानवता भुगत रही सरंजाम ।

असाध्य रोग, भूकम्प, सुनामी,  क्या आँखों से दूर है ?

विवश पड़ा विज्ञान भी, वह मानव-चिंतन से मजबुर है ।

अब भी समय है, हे कृत्रिम मानव, झकझोरो अपनी संवेदना को,

कर लो अपनी दृष्टि साफ, समझो मानवता की वेदना को ।

अब रोकना यदि है विध्वंस, तो दुनियावालों ! एक ही समाधान है ।

जुट पड़ो बदलने अपनी चिंतन-प्रवृति,  यही विचार-क्रांति अभियान है ।

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क्यों नष्ट होनें दें उस बगीचे को, जो ईश्वर ने सजाये हैं ?

क्यों टुटने दें उन  सपनों को, जो कल नन्ही आँखों में आए हैं ?

क्यों न कर लें हौंसला बुलन्द, हम क्रांतिकारियों के साये हैं ?

प्रण है-न करने देंगे युग को मनमानी, हम युग बदलने आए हैं ।


मातृ दिवस पर….

मई 14, 2007

मुश्किलें तो आएँगी,

ख्वाब तो टूटेंगे ।

किस्मत तो रूठेगी,

धैर्य तो छूटेगा ।

जब लक्ष्य अचानक छूट जाएगा,

हाथों तक आते-आते ।

जब आँसू भी छोड़ना चाहेंगे,

साथ आँखों का  ।

जब सांत्वना भरे शब्द,

तब्दील हो जाएँगे, फ़ब्तियों में  ।

जब कोई तर्क इसका उत्तर नहीं दे पाएगी,

कि ये आखिर क्यों हुआ ?

जब आत्मा भी बागी हो जाएगी

और  शत्रु मन के साथ मिलकर,

तुम्हें दुत्कारेगी,  उलाहने देगी

और ललकारेगी, तुम्हारे अस्तित्व को ।

जब चिंतन स्वतंत्र नहीं होंगे

और उस क्षण, तम पूरी कोशिश करेगा

तुम्हें अपने आगोश में लेने की ।

जब कोई नहीं होगा ऐसा,

जो रोक सके या नियंत्रित कर सके,

इस नकारात्मक विचार-प्रवाह को,

उस खास बिन्दु पर,

जहाँ से निर्धारण होना है,

तुम्हारे भविष्य का ।

जब दिखाई नहीं देगी,

कोई  भी राह ।

तब लौट जाना अपने बचपन में,

कुछ देर के लिए,

एक दूधमुँहा शिशु बनकर ।

और, रोते रहना बेहाल,

तब तक,

जब तक कि माँ ले न ले,

तुझे अपनी गोद में ।

और उसकी आँचल के तले, उसके सान्निध्य में,

तुम सो न जाओ चैन की नींद,

ये आश्वासन, ये विश्वास पाकर-

कि जब-जब आँखों मेँ आँसू होंगे,

 माँ की गोद होगी –

जिसके सान्निध्य में हम भूल जाएँगे,

अपना हर गम ।

जब-जब जीवन की धूप होगी,

माँ खड़ी होगी पास, अपना आंचल फ़ैलाये ।

और जब-जब सपने टूटेंगे,

माँ की लोरियाँ सृजन करेंगी,

अगणित नूतन सपनों का ।

तब कोई भय, कोई असमंजस नहीं रहेगा,

बस रहेगा तो एक विश्वास,

जिसके होने पर ज़िन्दगी कभी उदास नहीं लगती ।


आह्‌वान

मई 5, 2007

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युवा,

जिसका चिंतन कभी वृद्ध नहीं हुआ ।

जिसे विश्वास है अपने-आप पर ।

जिसमें उमंग है, साहस है, जोश है,

कुछ कर-गुजरने का ।

जो सक्षम है, हवाओं का रूख मोड़ने में ।

युवा,

जिसे भय नहीं, कितना भी गहरा तम हो ।

जिसे संशय नहीं रत्ती भर भी अपनी जीत पर ।

जिसकी आँखों में स्वप्न है,

एक “उज्जवल भविष्य” के निर्माण का ।

युवा,

जो कभी जीता नहीं,

अपनी प्रसिद्धि या पहचान के लिए ।

जो जीता और मरता है तो बस,

अपने मूल्यों के आन के लिए ।

युवा,

जिसे गर्व है, अपनी संस्कृति पर ।

जिसे भान है, अपनी मर्यादा का ।

जिसे बोध है, अपने कर्तव्यों का ।

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आवाहन है, आमंत्रण है,

ऐसे सभी युवाओं का,

इस युग-संधि की वेला में ।

कि अब वक्त आ गया है,

अपनी-अपनी भूमिका निभाने का ।

अपने प्रतिभा-परिष्कार से,

और अपने चरित्र-चिंतन-व्यवहार से,

समस्त विश्व के सामने,

एक उदाहरण प्रस्तुत करने का ।

ताकि गूँज उठे यह प्रतिध्वनि चारों ओर,

कि- “हे असुरता,

अब समय आ गया है,

कि तुम दूर हो जाओ,

मानव-मात्र की मानसिकता से ।

वरना, कहीं इस विचार-क्रांति की ज्वाला में,

तुम्हें तिल-तिल जलकर मरना न पड़े ।”

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*युवा चेतना शिविर, पुणे (भारत)

८ से १० जून २००७

सम्पर्क : shrrutankur@gmail.com