विचार-क्रांति अभियान
June 17, 2007यों कोसने परिस्थिति को, सौ बहाने हमने पाए हैं,
किंतु जूझने को अंधकार से, कितने कदम हमने उठाए हैं ?
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कहने को हर कोई कहता, राष्ट्र दुर्बल, अविकसित, अनुशासनहीन है,
पर अपने को क्या वास्ता, अपनी दुनिया तो रंगीन है ?
दिनों-दिन समाज में, लूट-बलात्कार-हिंसा बढ़ रहे,
और हम हाथों-पे-हाथ धरकर, अपनी बारी का इंतजार कर रहे ।
यूँ जाति-धर्म के नाम पर, हम हमेशा से लड़ रहे,
पर उन चलचित्रों का क्या, जो संस्कृति को नंगा कर रहे ?
जो लूटता कोई हमें तो कहते, भगवन ! क्यों भेजा आततायी को,
कैसे हो गये हम विस्मृत, कि कल ठगा था अपने भाई को?
परीक्षा-परिणामों से बढ़ती खु़दकुशी, क्यों हृदय हुआ इतना कमजोर ?
अँधाधुँध दिमागी प्रतियोगिता में, हम भूल गये बाहुओं का जोर ।
वृद्ध माँ-बाप की बढ़ती दुर्दशा, हर तरफ़ टूटता परिवार है,
कहाँ गया वो प्रेम-स्नेह, जो सुखी परिवार का आधार है ?
हमको ना थी कुछ खबर, हम तो उलझे रहे व्यापार में,
कब मानसिकता हुई इतनी तंग, कि बेटे-बेटी बिकने लगे बाजार में ?
जो फाँसती कोई बीमारी, तो कहते प्रकृति का प्रकोप है,
यूँ मुँह में लेकर गाँजा-सिगरेट, कहते जवानी का शौक है ।
क्या गूँजती नहीं कानों में, बाढ़-सूखा पीड़ितों की आवाज,
क्या करम हम कर रहे, कि प्रकृति हुई हमसे नाराज ?
धन-बल की अति-महत्वाकांक्षा में, मानवता का शोषण हो रहा,
और इस अत्याचार से, नक्सलवाद, आतंकवाद का पोषण हो रहा ।
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हे प्रभु, कैसी दृष्टि आज, कि कुछ पुण्य नहीं, कुछ पाप नहीं,
अपने कुकर्मों पे पश्चाताप नहीं, अपने पतन पर भी विलाप नहीं ?
इस दृष्टि ने ऐसे करवाये, मानव से अप्राकृतिक, अनैतिक काम,
प्रकृति हो गई रूष्ट हमसे, मानवता भुगत रही सरंजाम ।
असाध्य रोग, भूकम्प, सुनामी, क्या आँखों से दूर है ?
विवश पड़ा विज्ञान भी, वह मानव-चिंतन से मजबुर है ।
अब भी समय है, हे कृत्रिम मानव, झकझोरो अपनी संवेदना को,
कर लो अपनी दृष्टि साफ, समझो मानवता की वेदना को ।
अब रोकना यदि है विध्वंस, तो दुनियावालों ! एक ही समाधान है ।
जुट पड़ो बदलने अपनी चिंतन-प्रवृति, यही विचार-क्रांति अभियान है ।
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क्यों नष्ट होनें दें उस बगीचे को, जो ईश्वर ने सजाये हैं ?
क्यों टुटने दें उन सपनों को, जो कल नन्ही आँखों में आए हैं ?
क्यों न कर लें हौंसला बुलन्द, हम क्रांतिकारियों के साये हैं ?
प्रण है-न करने देंगे युग को मनमानी, हम युग बदलने आए हैं ।
Posted by राजेश रंजन