कड़ी

कड़ी जो जोड़ती है-
कर्तव्य को अधिकार से,
वाणी को व्यवहार से,
सादगी को श्रृंगार से,
नफ़रत को प्यार से ।

कड़ी जो जोड़ती है -
अमीर को फ़कीर से,
आत्मा को शरीर से,
प्रसन्नता को पीर से,
जोशीलेपन को धीर से |

कड़ी जो जोड़ती है-
संस्कृति को सभ्यता से,
बड़प्पन को महानता से,
भौतिकता को नैतिकता से,
आदर्शवाद को व्यावहारिकता से ।

कड़ी जो जोड़ती है-
फ़ैशन को शालीनता से,
पुरातन को नवीनता से,
अहंकार को हीनता से,
सरलता को गंभीरता से ।

कड़ी जो जोड़ती है-
दिल को दिमाग से,
पानी को आग से,
मनोरंजन को वैराग से |

कड़ी जो जोड़ती है-
अध्यात्म को विज्ञान से,
श्वाँस को प्राण से,
अस्थिरता को विराम से ।

कड़ी जो जोड़ती है-
जवानी को बुढ़ापे से,
आँगन को अहाते से ।

कड़ी जो जोड़ती है-
पूरब को पश्चिम से,
आदि को अंतिम से ।

कड़ी जो जोड़ती है-
तुच्छ को महान से,
इंसान को भगवान से,
इंसान को इंसान से ।

वो कड़ी कहीं खो गयी है शायद ।
क्या हममें है वो लचक,
कि हम बन सकें वो कड़ी ?

10 Responses to “कड़ी”

  1. Ankur Says:

    very nice poem… keep it up.

  2. MEET Says:

    बहुत ही बढ़िया रचना. भाई बधाई आप को. मन को भा गई, मन पर छा गई. सोचने लगा मेरे जैसा इंसान भी !

  3. Swati Didi(pune) Says:

    Excellent Job !!
    Its really a kadi jo jod rahi hai bhai ko bahan se , putra ko ma se ….
    I wish aapki kavitayein bane woh kadi jo d sake bhawnao ko karm se , kathani ko karni se…

    With Love Swati Didi

  4. DR. CHANDRAKUMAR JAIN Says:

    prerak aur marmsparshi rachna.

  5. Rakesh Malik Says:

    gayatri parijan to unhe bas gurudev se jodein jo gayatri pariwar ke sadasya nahi hain

  6. Vivek Kumar Singh Says:

    I have never seen or read such rhythmic and relevant poem by a non-professional poet!
    Certainly u are gifted with this art, May u be master in it.

  7. Mehul Says:

    awesome! Great poem. Hope to see more of these.

  8. राजेंद्र माहेश्वरी Says:

    आश्वासन ( गुरुदेव )

    तुम न घबराओ न आंसू ही बहाओ अब,
    और कोई हो न हो, पर मैं तुम्हारा हूँ |
    मैं खुशी के गीत गा-गा कर सुनाऊंगा,
    तुम न घबराओ…………………………||

    मानता हूँ ठोकरें तुमने सदा खाईं,
    जिंदगी के दांव में, हारें सदा पाईं |
    बिजलियाँ दुःख की, निराशा की सदा टूटीँ,
    मन गगन पर वेदना की बदलियाँ छाईं |
    पोंछ दूँगा मैं तुम्हारे अश्रु गीतों से,
    तुम सरीखे बे-सहारों का सहारा हूँ |
    मैं तुम्हारे घाव धो मरहम लगाऊँगा,
    मैं विजय के गीत गा-गा कर सुनाऊंगा |
    तुम न घबराओ…………………………||

    खा गई इंसानियत को भूख यह भूखी,
    स्नेह ममता को गई पी प्यास यह सूखी |
    जानवर भी पेट का साधन जुटाते हैं,
    जिंदगी का हक़ नही है रोटियां रूखी |
    और कुछ माँगो हँसी माँगो खुशी माँगो,
    खो गए हो, दे रहा तुमको इशारा हूँ |
    आज जीने की कला तुमको सिखाऊंगा,
    जिन्दगी के गीत गा-गा कर सुनाऊंगा |
    तुम न घबराओ…………………………||

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    http://yugnirman.blogspot.com/

    आपके स्नेहाधीन

    राजेंद्र माहेश्वरी
    पोस्ट- आगूंचा , जिला – भीलवाडा, पिन – ३११०२९ ( राजस्थान ) भारत
    ईमेल personallywebpage@gmail.com
    स्वरदूत – 01483-225554, 09929827894

  9. Neeta Thorat Says:

    simply gr8 combination of words very sweet & short poems which tell us a lot

  10. Rishikesh Pandit Says:

    Truly Heart Touching..
    I always love reading your poems..

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