यों कोसने परिस्थिति को, सौ बहाने हमने पाए हैं,
किंतु जूझने को अंधकार से, कितने कदम हमने उठाए हैं ?
———————————————————————
कहने को हर कोई कहता, राष्ट्र दुर्बल, अविकसित, अनुशासनहीन है,
पर अपने को क्या वास्ता, अपनी दुनिया तो रंगीन है ?
दिनों-दिन समाज में, लूट-बलात्कार-हिंसा बढ़ रहे,
और हम हाथों-पे-हाथ धरकर, अपनी बारी का इंतजार कर रहे ।
यूँ जाति-धर्म के नाम पर, हम हमेशा से लड़ रहे,
पर उन चलचित्रों का क्या, जो संस्कृति को नंगा कर रहे ?
जो लूटता कोई हमें तो कहते, भगवन ! क्यों भेजा आततायी को,
कैसे हो गये हम विस्मृत, कि कल ठगा था अपने भाई को?
परीक्षा-परिणामों से बढ़ती खु़दकुशी, क्यों हृदय हुआ इतना कमजोर ?
अँधाधुँध दिमागी प्रतियोगिता में, हम भूल गये बाहुओं का जोर ।
वृद्ध माँ-बाप की बढ़ती दुर्दशा, हर तरफ़ टूटता परिवार है,
कहाँ गया वो प्रेम-स्नेह, जो सुखी परिवार का आधार है ?
हमको ना थी कुछ खबर, हम तो उलझे रहे व्यापार में,
कब मानसिकता हुई इतनी तंग, कि बेटे-बेटी बिकने लगे बाजार में ?
जो फाँसती कोई बीमारी, तो कहते प्रकृति का प्रकोप है,
यूँ मुँह में लेकर गाँजा-सिगरेट, कहते जवानी का शौक है ।
क्या गूँजती नहीं कानों में, बाढ़-सूखा पीड़ितों की आवाज,
क्या करम हम कर रहे, कि प्रकृति हुई हमसे नाराज ?
धन-बल की अति-महत्वाकांक्षा में, मानवता का शोषण हो रहा,
और इस अत्याचार से, नक्सलवाद, आतंकवाद का पोषण हो रहा ।
——————————————————————
हे प्रभु, कैसी दृष्टि आज, कि कुछ पुण्य नहीं, कुछ पाप नहीं,
अपने कुकर्मों पे पश्चाताप नहीं, अपने पतन पर भी विलाप नहीं ?
इस दृष्टि ने ऐसे करवाये, मानव से अप्राकृतिक, अनैतिक काम,
प्रकृति हो गई रूष्ट हमसे, मानवता भुगत रही सरंजाम ।
असाध्य रोग, भूकम्प, सुनामी, क्या आँखों से दूर है ?
विवश पड़ा विज्ञान भी, वह मानव-चिंतन से मजबुर है ।
अब भी समय है, हे कृत्रिम मानव, झकझोरो अपनी संवेदना को,
कर लो अपनी दृष्टि साफ, समझो मानवता की वेदना को ।
अब रोकना यदि है विध्वंस, तो दुनियावालों ! एक ही समाधान है ।
जुट पड़ो बदलने अपनी चिंतन-प्रवृति, यही विचार-क्रांति अभियान है ।
———————————————————————
क्यों नष्ट होनें दें उस बगीचे को, जो ईश्वर ने सजाये हैं ?
क्यों टुटने दें उन सपनों को, जो कल नन्ही आँखों में आए हैं ?
क्यों न कर लें हौंसला बुलन्द, हम क्रांतिकारियों के साये हैं ?
प्रण है-न करने देंगे युग को मनमानी, हम युग बदलने आए हैं ।
June 18, 2007 at 4:08 am |
स्वागतम राजेश!
आपका यह ब्लाग बहुत अच्छा लगा। इसकी सामग्री भारतोदय को पुष्ट करने वाली है।
लिखते रहिये।
June 18, 2007 at 9:15 am |
awesome ………………………..keep writin.
August 31, 2007 at 11:16 am |
दिल की कलम से
नाम आसमान पर लिख देंगे कसम से
गिराएंगे मिलकर बिजलियाँ
लिख लेख कविता कहानियाँ
हिन्दी छा जाए ऐसे
दुनियावाले दबालें दाँतो तले उगलियाँ ।
NishikantWorld
July 20, 2008 at 10:07 am |
नवयुग यदि आएगा तो विचार शोधन द्वारा ही, क्रान्ति होगी तो वह लहू और लोहे से नही, विचारो की विचारो से काट द्वारा होगी, समाज का नवनिर्माण होगा तो वह सद् विचारो की स्थापना द्वारा ही संभव होगा |
visit this link also
http://yugnirman.blogspot.com/
आपके स्नेहाधीन
राजेंद्र माहेश्वरी
पोस्ट- आगूंचा , जिला – भीलवाडा, पिन – ३११०२९ ( राजस्थान ) भारत
ईमेल personallywebpage@gmail.com
स्वरदूत – 01483-225554, 09929827894