अमृतवाणी-५

लापरवाही एक प्रकार का अपराध है, यह एक प्रकार की आत्महत्या ही है। अपने-आपको, अपने धन या शरीर को आलस्य के तेजाब में गला देना लगभग वैसा ही है, जैसा कोई मंद विष खाकर अपनी अंतड़ियों को गला देता है ।

दूसरों के प्रति धोखा, आक्रमण, हिंसा, दुर्व्यवहार, द्वेष आदि अनेक प्रकार के अपराध लोग करते हैं । अपने आप के प्रति वैसा ही अपराध लापरवाही और आलस है । इससे अपना जीवन नष्ट हो जाता है । भविष्य की सभी उज्जवल संभावनाएँ समाप्त हो जाती हैं और वह दिन तेजी से निकट खिंचता चला जाता है, जिसे दुर्भाग्य और पतन का दिन कहकर पश्चाताप किया जाता है ।

guruji1.jpg - वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

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3 Responses to “अमृतवाणी-५”

  1. Sanjeeva Tiwari Says:

    सत्‍संग व बौद्धिक चर्चा की आवश्‍यकता हमारे चिटठा जगत में थी स्‍वागत है आपका

  2. सृजन शिल्पी Says:

    गुरुदेव की अमृतवाणी प्रस्तुत करने के लिए धन्यवाद! मेरे चिट्ठे का ‘सृजन शिल्पी’ नामकरण गुरुदेव की ही प्रेरणा है। वे मेरे प्रेरणास्रोत रहे हैं।

  3. उन्मुक्त Says:

    हिन्दी चिट्ठा जगत में आपका स्वागत है।

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