अमृतवाणी-५
लापरवाही एक प्रकार का अपराध है, यह एक प्रकार की आत्महत्या ही है। अपने-आपको, अपने धन या शरीर को आलस्य के तेजाब में गला देना लगभग वैसा ही है, जैसा कोई मंद विष खाकर अपनी अंतड़ियों को गला देता है ।
दूसरों के प्रति धोखा, आक्रमण, हिंसा, दुर्व्यवहार, द्वेष आदि अनेक प्रकार के अपराध लोग करते हैं । अपने आप के प्रति वैसा ही अपराध लापरवाही और आलस है । इससे अपना जीवन नष्ट हो जाता है । भविष्य की सभी उज्जवल संभावनाएँ समाप्त हो जाती हैं और वह दिन तेजी से निकट खिंचता चला जाता है, जिसे दुर्भाग्य और पतन का दिन कहकर पश्चाताप किया जाता है ।
April 30, 2007 at 8:41 am
सत्संग व बौद्धिक चर्चा की आवश्यकता हमारे चिटठा जगत में थी स्वागत है आपका
April 30, 2007 at 10:40 am
गुरुदेव की अमृतवाणी प्रस्तुत करने के लिए धन्यवाद! मेरे चिट्ठे का ‘सृजन शिल्पी’ नामकरण गुरुदेव की ही प्रेरणा है। वे मेरे प्रेरणास्रोत रहे हैं।
April 30, 2007 at 9:11 pm
हिन्दी चिट्ठा जगत में आपका स्वागत है।