हे हमारे पूज्यवर गुरू, हे हमारे ॠषिवर गुरू ।
पाकर तुझको लगता है, जीवन है यह कल्पतरू ।
जिसकी तलाश थी अब तक, वो अनुभूति दिलाई आपने,
पीने की थी जो इच्छा अब तक, वो अमृत पिलाई आपने ।
तेरे ही दम से तो, ये जीवन है, संसार है,
वरना हम जीकर भी क्या जिए, जब लक्ष्य ही निराधार है ।
आप ही ने सिखाया हमें, कैसे करें सुमिरन शुरु ।हे हमारे ……….
सृष्टि के हर कण-कण में, आपका जीवंत आभास है,
हर युग में, हर काल में, आपका सुन्दर इतिहास है ।
कभी कबीर, कभी समर्थ रामदास, कभी आप ही हो परमहंस,
आते हो हर रुप में, रोकने सृष्टि का विध्वंस ।
तम टिक नहीं पाया सामने, वो रावण हो या वंश कुरु ।हे हमारे ……….
आप ही तेज, आप ही पुंज, आप ही दिव्य प्रकाश हैं,
आप ही हैं अखण्ड-ज्योति, आप ही जीवन के उल्लास हैं ।
देना हममें बस इतनी क्षमता, भूल ना पाएँ तुझे एक पल,
साध सकें उस मन को, जो है बड़ी ही चंचल ।
पाकर तुझको बन जाए ऊर्वर, हो कितनी भी शुष्क मरु ।हे हमारे ……….
