अमृतवाणी-३

बच्चे हमसे कुछ चाहते हैं, सो ठीक है, पर बदले में हम कुछ ना चाहते हों- ऐसी बात नहीं । नव-निर्माण के कंधे पर लदा उत्तरदायित्व मिल-जुल कर संपन्न हो सकने वाला कार्य था, सो समझदारों में से कोई हाथ न लगा, तो अपने बाल परिवार (गायत्री परिवार) को ही लेकर जुट पड़े हैं ।

बात अगले दिनों की आती है। हमें अपने बच्चों के लिये क्या करना चाहिए?- इस कर्तव्य-उत्तरदायित्व का सदा ध्यान रहा है और जब तक चेतना का अस्तित्व है, उसका स्मरण बना भी रहेगा । इस संबंध में स्मरण दिलाने योग्य बात एक ही है कि हमारी आकांक्षा और आवश्यकता को भूला न दिया जाय ।

परिजन अब तक के सभी महत्वपूर्ण कार्यों में साथ देते, हाथ बँटाते और कदम-से-कदम मिलाकर चलते रहे हैं । विश्वास किया गया है कि अग्नि परीक्षा की घड़ी में भी साथ नहीं छोड़ेंगे, मुँह नहीं मोड़ेंगे । इस श्रेय साधना में सभी प्राणवानों की बराबर की भागीदारी रहेगी ।

gurudevskg.jpg – वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

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