जिस प्रकार ईश्वर की महान कृतियों को देखकर ही उसकी गारिमा का अनुमान लगाया जाता है, उसी प्रकार हमारा कर्तव्य पोला था या ठोस- यह अनुमान उन लोगों की परख करके लगाया जाएगा, जो हमारे श्रद्धालु एवं अनुयायी कहे जाते हैं । यदि वाचालता भर के प्रशंसक और दण्डवत प्रणाम भर के श्रद्धालु रहे, तो माना जाएगा कि सब कुछ पोला रहा । असलियत कर्म में सन्निहित है । वास्तविकता की परख क्रिया से होती है ।
यदि अपने गायत्री परिवार की क्रिया पद्धति का स्तर दूसरे अन्य नर-पशुओं जैसा ही बना रहा तो हमें स्वयं अपने श्रम और विश्वास की निरर्थकता पर कष्ट होगा और लोगों की दृष्टि में उपहासास्पद बनना पड़ेगा ।
- वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य