ये बताओ क्या करें हम

अप्रैल 20, 2009

हे गुरु हे मार्गदर्शक, तुमसे एक विनती करें हम,
मन फँसा है उलझनों में, ये बताओ क्या करें हम |
तुम चले गये देह ‘पार्थिव’ छोड़कर, व्यामोह को निरर्थक बताकर,
हो गये विलीन ‘कारण’ में, संग रहने का विश्वास दिलाकर |
हाँ हम तुम्हारी अनुभूति, हर क्षण को पाते हैं,
हर राह निष्कंटक करते हुए, तेरे अंश आते हैं |
पर कभी टीस जो इतनी ‘नासूर’ हो,
तेरे दर्शन के बिना नहीं कुछ मंजूर हो,
तो बताओ क्या करें हम??

तुम ‘धूप-दीप-नैवेद्द्य’ अर्पण, सबको निरर्थक बताते हो,
बस ‘जीवन-साधना’ में ही, शिष्य होने का मूल्य चाहते हो |
हाँ ये वादा है हमारा, सदैव तुम्हारे पथ पर चलेंगे,
जीवन के अंतिम प्रहर तक, अपने दुष्प्रवृत्तियों से लड़ेंगे |
पर इतने पे भी जो मन ना माने,
कुछ भाव रूप देने को ठाने,
तो बताओ की क्या दें हम ??

तुम पिता से गुरु हुए, फिर गुरु से भगवान हो गये ,
हम पुत्र तेरे सान्निध्य में, नरपशु से इंसान हो गये |
पर नादान मन है इसी ज़िद में, उसे पुत्र होने का भान चाहिए,
तुम भले ही हो भगवन, पर तेरी गोद में स्थान चाहिए |
ऐसे चिंतन में कोई ग़लती हो जाए,
कोई शब्द गरिमा अनुकूल ना आए,
बताना भगवन किसे दोष दें हम ??

- ‘अंतः उर्जा जागरण सत्र’ के दौरान (13.03.09)